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Showing posts from July, 2022

ए मेरे प्यारे "जिन"

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  ए मेरे प्यारे जिन, कल रात एक दफ़ा फिर से तुम ने मुझे अपनी मौजूदगी का एहसास दिलवाया, जब रात के ढाई बजे मैं सोने की जद्दो-जहद में अपने बिस्तर पर ज़िंदा लाश की तरह आँखें मूँद कर पड़ा हुआ था, और तुम अचानक एक ख़ौफ़नाक हुलये में मेरे सीने पर आ बैठे थे, अपने नाख़ूनों से मेरे गले की चमड़ी उधेड़ने लगे। जब मैंने आँखें खोलीं तो मुझे तुम्हारा आधा जला हुआ चेहरा दिखाई दिया, जिस पर मख्खियाँ भिनभिना रही थीं, उस मुर्दे के ज़ख़्म दिखाई दिए जिस का तुम ने रूप इख़्तियार किया था, वो लाल आँखें दिखाई दीं जिन्हें देख कर डर के मारे मेरे दिल की धड़कने रुक गईं, वो सफ़ेद लिबास दिखाई दिया जो तुक से नुक तक ख़ून में सना हुआ था, वो हाथ दिखाई दिए जिन्हें देख कर ऐसा लग रहा था जैसे मानों किसी ने सूई चुभो-चुभो कर उन्हें उधेड़ा हो। जब मेरे ज़हन पर ख़ौफ़ का एहसास तारी हुआ तो मैंने अपने बिस्तर से उठ कर दरवाज़े की ओर भागने की लाख कोशिश करी लेकिन तुम्हारे बदन से निकली बू ने मुझे सर से ले कर पाऊँ तक जकड़ लिया और कुछ देर की मशक्क़त के बाद मेरे जिस्म ने भी मेरा साथ छोड़ दिया। क़रीबन एक घँटे तक मुझे इज़ा पहुँचाने के बाद तुम यूँ ग़ायब हो गए जैसे तुम्...

क़ब्र

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  अम्मी अब्बू बीवी बच्चे भाई बहन इक इक करके सब अपने मर जाएँगे ग़ुस्ल कराएगी बेटी अपनी माँ को भाई बहनों को काँधा लगवाएंगें बीवी अपने शोहर की इद्दत काटेंगी शोहर भी बीवी का शौक मनाएँगे याद करेंगे बाप भी अपने बेटों को  बेटे भी अपने बापों को रोयेंगे जिन नन्हे हाथों से उंगली थामी थी जिन नन्हे पैरों ने चलना सीखा था उन नन्हे हाथों को नन्हें पैरों को जैसे तैसे दफ़नाने लेजाएँगे और फिर वो लाशें क़ब्रों में उतरेंगी ऊपर से मिट्टी की बारिश होगी कुछ लोगों की आँखों मे आँसू होंगे कुछ लोगों के ज़हनों में साज़िश होगी अपने अपने लोगों से बात करेंगे अपने जाने वालों को याद करेंगे कुछ के होठों पर तारीफें होंगीं कुछ मरने वालों की फ़रयाद करेंगें और तब क़ब्रें सब का चेहरा देखेंगी सब का चेहरा देखेंगी और सोचेंगी अब अपने ही अपनों को दफ़नाएँगे  दफ़ना कर ये सब अपने घर जाएँगे कुछ रोएँगे चींखेंगें चिल्लायेंगे कुछ घर जा कर अच्छे से सो जाएँगे दुनिया के आगे अपना ग़म गा लेंगे मरने वालों की स्टोरी डालेंगे फिर यूँ ही धीरे धीरे वक़्त कटेगा और मय्यत का ये ज़ख़्म भी भर जायेगा इक दिन इन सब लोगों के ज़हनों में ये मंज़र भी धुँदला प...

उम्मीद पर तो दुनिया क़ायम है।

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  "उम्मीद पर तो दुनिया कायम है" मैं जब भी ये जुमला सुनता हूँ तो मेरे ज़ेहन में ये ही सवाल आता है, कि जब अमुमन उम्मीद ख़ुद ही कायम नहीं रहती, तो उम्मीद पर दुनिया कैसे कायम रह सकती है? बहरहाल "उम्मीद" लफ़्ज़ ही अपने आप में एक राज़ है, एक ऐसा राज़ जिसे जानने की हसरत तो सब रखते हैं, लेकिन यह राज़ हर-किसी पर नहीं खुलता। इंसान उम्मीद रखता है, बेहतर कल की, ख़ुशियों की, अमन की, सुकून की, लेकिन क्या हर उम्मीद पूरी होती है? ज़ाहिर है नहीं होती, और होनी भी नहीं चाहिए, कियूंकि अगर हर उम्मीद, हर चाहत पूरी होने लगे, तो ज़िन्दगी बद-मज़ा हो जाएगी।  लेकिन उम्मीद की एक ख़ासियत ये भी है कि उम्मीद कभी अकेली नहीं टूटती, उम्मीद के साथ-साथ टूटती है इंसान की हिम्मत, इंसान का हौसला, इंसान का सपना, और कभी-कभी तो साँसे भी।  बेचैनी, झुंझलाहट, सीने में चुभन, ख़ालीपन, ये एक टूटे हुए शख़्स के लिए आम बात है। जैसे-जैसे वक़्त गुज़रता है, ये दरारें गहरी और गरही होती जाती हैं, और फिर आती है आख़िरी हद, "ख़ुद-कुशी के ख़्याल"। अगर ज़िन्दगी एक खेल है, तो ये ख़्याल इस खेल का आख़री पड़ाव है, वो पड़ाव जिस से हार और जीत का...