ए मेरे प्यारे "जिन"
ए मेरे प्यारे जिन,
कल रात एक दफ़ा फिर से तुम ने मुझे अपनी मौजूदगी का एहसास दिलवाया, जब रात के ढाई बजे मैं सोने की जद्दो-जहद में अपने बिस्तर पर ज़िंदा लाश की तरह आँखें मूँद कर पड़ा हुआ था, और तुम अचानक एक ख़ौफ़नाक हुलये में मेरे सीने पर आ बैठे थे, अपने नाख़ूनों से मेरे गले की चमड़ी उधेड़ने लगे। जब मैंने आँखें खोलीं तो मुझे तुम्हारा आधा जला हुआ चेहरा दिखाई दिया, जिस पर मख्खियाँ भिनभिना रही थीं, उस मुर्दे के ज़ख़्म दिखाई दिए जिस का तुम ने रूप इख़्तियार किया था, वो लाल आँखें दिखाई दीं जिन्हें देख कर डर के मारे मेरे दिल की धड़कने रुक गईं, वो सफ़ेद लिबास दिखाई दिया जो तुक से नुक तक ख़ून में सना हुआ था, वो हाथ दिखाई दिए जिन्हें देख कर ऐसा लग रहा था जैसे मानों किसी ने सूई चुभो-चुभो कर उन्हें उधेड़ा हो।
जब मेरे ज़हन पर ख़ौफ़ का एहसास तारी हुआ तो मैंने अपने बिस्तर से उठ कर दरवाज़े की ओर भागने की लाख कोशिश करी लेकिन तुम्हारे बदन से निकली बू ने मुझे सर से ले कर पाऊँ तक जकड़ लिया और कुछ देर की मशक्क़त के बाद मेरे जिस्म ने भी मेरा साथ छोड़ दिया। क़रीबन एक घँटे तक मुझे इज़ा पहुँचाने के बाद तुम यूँ ग़ायब हो गए जैसे तुम्हारा वजूद हो ही नहीं, जब तुम्हारे नुकीले नाख़ून मेरे गोश्त को चीरते हुए मेरे गले की हड्डी से टकराते तो मेरा दिल दहल जाता, जब तुम्हारी उंगलियां मेरे हलक़ को ज़ख़्मी करतीं तो मेरे आँसू निकल आते, मैंने हर वो दर्द महसूस किया है जो तुम मुझे महसूस करवाना चाहते थे, और उस पर कमाल ये है कि दुनिया वालों को मेरे जिस्म पर खरोंच का एक निशान तक नहीं मिला।
तुम्हारे बारे में मैं किसी को कुछ नहीं बताता, नहीं ऐसा नहीं है कि मैंने कोशिश नहीं करी, मैंने कोशिश करी थी, मगर जिसे भी मैंने तुम्हारा किस्सा सुनाया, उस ने मुझे ज़हनी मरीज़ समझा। लोग चाहें कुछ भी कहें लेकिन मैं जानता हूँ कि तुम हो, तुम्हारी मौजूदगी मेरा भरम नहीं है, तुम्हारी ज़ात वो हक़ीक़त है जिसे मैं चाह कर भी नहीं झुटला सकता, तुम वो सच हो जिसे किसी झूठ के मर्तबान में बंद नहीं किया जा सकता।
ए मेरे प्यारे जिन, शायद तुम किसी इंसान के हुक़्म से मेरे पीछे लगे हो, शायद मुझ से जाने अंजाने तुम्हारी शान में कोई गुस्ताख़ी हो गई, या फिर शायद तुम इस लिए खफ़ा हो कि तुम आग से बने हो और मैं मिट्टी से, फिर भी ख़ुदा ने मुझे तुम से ज़ियादा अफ़ज़ल बताया है। वजह चाहें जो भी हो लेकिन मुझे तुम से कोई शिकायत नहीं है, कोई नाराज़गी नहीं, तुम तो अपना काम कर रहे हो, लेकिन हाँ एक गुज़ारिश ज़रूर है, कि जब अगली दफ़ा तुम मेरी खाल उधेड़ो तो मेरे जिस्म पर चोट के निशान भी छोड़ देना, ताक़ी मैं कम-अज़-कम लोगों के सामने उन ज़ख़्मों की नुमाइश कर सकूँ।

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