क़ब्र
अम्मी अब्बू बीवी बच्चे भाई बहन
इक इक करके सब अपने मर जाएँगे
ग़ुस्ल कराएगी बेटी अपनी माँ को
भाई बहनों को काँधा लगवाएंगें
बीवी अपने शोहर की इद्दत काटेंगी
शोहर भी बीवी का शौक मनाएँगे
याद करेंगे बाप भी अपने बेटों को
बेटे भी अपने बापों को रोयेंगे
जिन नन्हे हाथों से उंगली थामी थी
जिन नन्हे पैरों ने चलना सीखा था
उन नन्हे हाथों को नन्हें पैरों को
जैसे तैसे दफ़नाने लेजाएँगे
और फिर वो लाशें क़ब्रों में उतरेंगी
ऊपर से मिट्टी की बारिश होगी
कुछ लोगों की आँखों मे आँसू होंगे
कुछ लोगों के ज़हनों में साज़िश होगी
अपने अपने लोगों से बात करेंगे
अपने जाने वालों को याद करेंगे
कुछ के होठों पर तारीफें होंगीं
कुछ मरने वालों की फ़रयाद करेंगें
और तब क़ब्रें सब का चेहरा देखेंगी
सब का चेहरा देखेंगी और सोचेंगी
अब अपने ही अपनों को दफ़नाएँगे
दफ़ना कर ये सब अपने घर जाएँगे
कुछ रोएँगे चींखेंगें चिल्लायेंगे
कुछ घर जा कर अच्छे से सो जाएँगे
दुनिया के आगे अपना ग़म गा लेंगे
मरने वालों की स्टोरी डालेंगे
फिर यूँ ही धीरे धीरे वक़्त कटेगा
और मय्यत का ये ज़ख़्म भी भर जायेगा
इक दिन इन सब लोगों के ज़हनों में
ये मंज़र भी धुँदला पड़ जायेगा
अपनी अपनी दुनिया में खो जाएँगे
ख़ुद के ज़िंदा होने पर इतराएँगे
लेकिन फिर सारी दुनिया घूम के इक दिन
ये भी तो इन ही क़ब्रों में आएँगे
इन की लाशें भी क़ब्रों उतरेंगी
इन पर भी मिट्टी की बारिश होगी
कुछ लोगों की आँखों मे आँसू होंगे
कुछ लोगों के ज़हनों में साज़िश होगी
पथ्थर इनकी भी पसली तोड़ेंगे
इन के जिस्म को भी तो कीड़े खाएँगे
अम्मी अब्बू बीवी बच्चे भाई बहन
इक इक करके सब अपने मर जाएँगे
~अदनान अहमद

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