उम्मीद पर तो दुनिया क़ायम है।
"उम्मीद पर तो दुनिया कायम है" मैं जब भी ये जुमला सुनता हूँ तो मेरे ज़ेहन में ये ही सवाल आता है, कि जब अमुमन उम्मीद ख़ुद ही कायम नहीं रहती, तो उम्मीद पर दुनिया कैसे कायम रह सकती है?
बहरहाल "उम्मीद" लफ़्ज़ ही अपने आप में एक राज़ है, एक ऐसा राज़ जिसे जानने की हसरत तो सब रखते हैं, लेकिन यह राज़ हर-किसी पर नहीं खुलता। इंसान उम्मीद रखता है, बेहतर कल की, ख़ुशियों की, अमन की, सुकून की, लेकिन क्या हर उम्मीद पूरी होती है? ज़ाहिर है नहीं होती, और होनी भी नहीं चाहिए, कियूंकि अगर हर उम्मीद, हर चाहत पूरी होने लगे, तो ज़िन्दगी बद-मज़ा हो जाएगी।
लेकिन उम्मीद की एक ख़ासियत ये भी है कि उम्मीद कभी अकेली नहीं टूटती, उम्मीद के साथ-साथ टूटती है इंसान की हिम्मत, इंसान का हौसला, इंसान का सपना, और कभी-कभी तो साँसे भी।
बेचैनी, झुंझलाहट, सीने में चुभन, ख़ालीपन, ये एक टूटे हुए शख़्स के लिए आम बात है। जैसे-जैसे वक़्त गुज़रता है, ये दरारें गहरी और गरही होती जाती हैं, और फिर आती है आख़िरी हद, "ख़ुद-कुशी के ख़्याल"।
अगर ज़िन्दगी एक खेल है, तो ये ख़्याल इस खेल का आख़री पड़ाव है, वो पड़ाव जिस से हार और जीत का फ़ैसला किया जाता है, जो इस ख़्याल को महज़ एक ख़्याल समझ कर भूल जाए, वो जीता, और जो इस ख़्याल को हक़ीक़त में बदल दे वो हारा, अब सवाल ये है कि आख़िर ये हार-जीत के नियम बनाए किस ने? कहाँ लिखे हैं ये नियम? किसी की ज़िंदगी की हार-जीत का फ़ैसला कोई दूसरा कैसे कर सकता है? और पूरी दुनिया आँख बंद करके इन नियमों को क्यूँ मानती है?। ख़ैर सवाल तो हज़ारों हैं लेकिन जवाब सिर्फ़ एक।
कि चाहें अंजाम कुछ भी हो, पर उम्मीद टूटने का मतलब ये नहीं है कि इंसान उम्मीद रखना ही छोड़ दे, कियूंकि,
"उम्मीद पर तो दुनिया कायम है"।
~अदनान अहमद

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