ए मेरे प्यारे "जिन"
ए मेरे प्यारे जिन, कल रात एक दफ़ा फिर से तुम ने मुझे अपनी मौजूदगी का एहसास दिलवाया, जब रात के ढाई बजे मैं सोने की जद्दो-जहद में अपने बिस्तर पर ज़िंदा लाश की तरह आँखें मूँद कर पड़ा हुआ था, और तुम अचानक एक ख़ौफ़नाक हुलये में मेरे सीने पर आ बैठे थे, अपने नाख़ूनों से मेरे गले की चमड़ी उधेड़ने लगे। जब मैंने आँखें खोलीं तो मुझे तुम्हारा आधा जला हुआ चेहरा दिखाई दिया, जिस पर मख्खियाँ भिनभिना रही थीं, उस मुर्दे के ज़ख़्म दिखाई दिए जिस का तुम ने रूप इख़्तियार किया था, वो लाल आँखें दिखाई दीं जिन्हें देख कर डर के मारे मेरे दिल की धड़कने रुक गईं, वो सफ़ेद लिबास दिखाई दिया जो तुक से नुक तक ख़ून में सना हुआ था, वो हाथ दिखाई दिए जिन्हें देख कर ऐसा लग रहा था जैसे मानों किसी ने सूई चुभो-चुभो कर उन्हें उधेड़ा हो। जब मेरे ज़हन पर ख़ौफ़ का एहसास तारी हुआ तो मैंने अपने बिस्तर से उठ कर दरवाज़े की ओर भागने की लाख कोशिश करी लेकिन तुम्हारे बदन से निकली बू ने मुझे सर से ले कर पाऊँ तक जकड़ लिया और कुछ देर की मशक्क़त के बाद मेरे जिस्म ने भी मेरा साथ छोड़ दिया। क़रीबन एक घँटे तक मुझे इज़ा पहुँचाने के बाद तुम यूँ ग़ायब हो गए जैसे तुम्...